केशव बलीराम हेडगेवार ( १ अप्रैल, १८८९ - २१ जून १९४०) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं क्रांतिकारी थे। उनका जन्म हिन्दू वर्ष प्रतिपदा के दिन हुआ था। यह दिन महाराष्ट्र में गुढ़ी पड़वा दिवस के रूप में मनाया जाता है। नवर्षारंभ होने के कारण यह दिन बड़ा शुभ माना जाता है। डॉ.हेडगेवार का जन्म १ अप्रैल, १८८९ को महाराष्ट्र के नागपुर जिले में पंडित बलिराम पंत हेडगेवार के घर हुआ था। इनकी माता का नाम रेवतीबाई था। माता-पिता ने पुत्र का नाम केशव रखा। केशव का बड़े लाड़-प्यार से लालन-पालन होता रहा। उनके दो बड़े भाई भी थे, जिनका नाम महादेव और सीताराम था। उनके पिता वेद-शास्त्र के विद्वान थे व पंडिताई से परिवार का भरण-पोषण करते थे। उन्होंने अग्निहोत्र का व्रत लिया था।केशव के सबसे बड़े भाई महादेव भी शास्त्र-ज्ञाता थे। महादेव कुश्ती और शारीरिक शक्ति के लिए बहुत मशहूर थे। वे रोज अखाड़े में जाकर व्यायाम करते थे। इसके अलावा वे मुहल्ले के बच्चों को एकत्र करके उन्हें कुश्ती के दांव-पेच सिखाते रहते थे। महादेव, भारतीय संस्कृति और विचारों का बड़ी सख्ती से पालन करते थे। केशव के मानस पटल पर महादेव के विचारों का गहरा प्रभाव था। केशव बाल्यकाल से ही क्रांतिकारक विचारों धनी थे। वे डॉक्टरी पढ़ने के लिये कलकत्ता गये। केशवराव ने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। किंतु देश-सेवा के लिए नौकरी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। वहां क्रांतिकारियों के साथ उनका मेल-मिलाप हुआ। वे वहां अनुशीलन समिति के अंतरंग सदस्य भी बनाये गए। क्रांतिकारियों की सब गतिविधियों का ज्ञान और तंत्र सीख कर वे नागपुर लौटे। लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद केशवकॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे। गांधीजी के अहिंसक असहयोग आन्दोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लिया, किंतु ख़िलाफ़त आंदोलन की आलोचना की। ये गिरफ्तार भी हुए और सन्१९२२ में जेल से छूटे। नागपुर में १९२३ के दंगों में के दौरान इन्होंने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया। अगले साल सावरकर के पत्र हिन्दुत्व का संस्करण निकला जिसमें इनका योगदान भी था। इसकी मूल पांडुलिपि इन्हीं के पास थी
डॉ.साहब ऐसे व्यक्ति थे, जिसने व्यक्ति की क्षमताओं को उभारने के लिए नए तौर-तरीके विकसित किए। हालांकि प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असफल क्रांति और तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक अर्ध-सैनिक संगठन की नींव रखी। १९२५ को दशहरे के दिन इन्होने नागपुर मे राष्टीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। इन्होने भारत की गुलामी के कारणो को पहचाना व इसके स्थाई समाधान हेतु संघ कार्य प्रारम्भ किया। इन्होंने सदा यही बताने का प्रयास किया, कि नई चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें नए तरीकों से काम करना पड़ेगा, स्वयं को बदलना होगा, पुराने तरीके काम नहीं आएंगे। डॉ.साहब१९२५ से १९४० तक, यानि मृत्यु पर्यन्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे। २१ जून,१९४० को इनका नागपुर में निधन हुआ। इनकी समाधि रेशम बाग,नागपुर में स्थित है, जहां इनका अंत्येष्टि संस्कार हुआ था। आज उनकी पुण्य तिथि पर उनको हमारा शत-शत नमन्।
No comments:
Post a Comment