Friday, 2 August 2013

जेहाद से लव जेहाद तक इस्लाम का सफर


जिस वक्त अरबों की धरती पर इस्लाम का उदय हुआ था उस वक्त उसके दुनिया भर में प्रचार-प्रसार की बात भी चली होगी। किसी नई चीज का प्रचार करना और लोगों को उस मनवाने के लिए तैयार करना शायद इतना सहज कार्य नहीं है, इसके लिए समय भी दरकार है और धैर्य की आवश्यकता तो और भी ज्यादा है। परन्तु इस्लाम के पैरोकार शायद अत्यंत जल्दी में थे। वे इस्लाम का परचम जल्दी से जल्दी दुनिया भर में फैला देना चाहते थे। इसलिए कुफर, काफिर और जेहाद इत्यादि अवधारणाओं को जन्म दिया गया। काफिर वही है जो इस्लाम को स्वीकार नहीं करता। जो स्वीकार कर ले वह तो मोमिन की श्रेणी में आ जाता है। अब मोमिनों का फर्ज है कि वे काफिरों को भी अपनी श्रेणी में लेकर आएं। पहला तरीका तो समझाने-बुझाने का ही होगा। लेकिन मान लीजिए कोई काफिर समझाने बुझाने से नहीं मानता। वह अपना पंथ, अपना इतिहास, अपनी विरासत और अपने पूर्वजों का नहीं छोडना चाहता तो मोमिनों के पास अपने फर्ज को सरअंजाम देने के लिए एक ही रास्ता बचता है कि वह उसका सिर कलम कर दे। मोमिन मानते हैं कि ऐसा करने से उन्हें जन्नत नसीब होगी और वहां हूरें मिलेंगी वह अलग से ईनाम होगा। जब यह कार्य सामूहिक रूप से किया जाए तो यही जेहाद हो जाता है। इस्लाम के रास्ते में जो भी आएगा या तो उसे मोमिन बनना होगा या फिर जेहादियों के हाथों अपनी जान गंवानी होगी। इस्लाम ने यह प्रयोग दुनिया के कई देशों में सफलतापूर्वक किया परन्तु उसके दुर्भाग्य से, हिन्दूस्थान में 800 साल भी ज्यादा बादशाहत करने के बावजूद इस्लाम इस मुल्क को ईरान, ईराक और मिस्त्र की तर्ज में नहीं ढाल सका।परन्तु लगता है कि इस्लाम के पैरेकारों ने इक्कीसवीं शताब्दी में भी अपने प्रयास नहीं छोडे हैं। उन्होंने भारत में स्वतंत्रता प्राप्त करने के जेहाद के साथ-साथ अब लव जेहाद का अविष्कार किया है। लव जेहाद का अर्थ है कि मुसलमान लडकों को इस बात का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाए कि हिन्दू लडकियों को प्यार के जाल में किस प्रकार फंसाया जाए और उसके बाद उनको मोमिन बनाकर उनसे शादी कर ली जाए। शादी के बाद या तो उन्हें बच्चे पैदा करने वाली मशीन में बदल दिया जाए या फिर किसी वैश्यालय में ढकेल दिया जाए या फिर साऊदी अरब के किसी शेख के हाथों में बेच दिया जाए। भारत में कई ईस्लामी संगठन इस लव जेहाद के लिए बाकायदा बजट मुहैया करवाते हैं और अपने प्रशिक्षित गुर्गों को महाविद्यालयों या विश्वविद्यायों में छात्र बनाकर दाखिल करवाते हैं और यदि ये लव जेहादी किसी हिन्दू लडकी को सफलतापूर्वक अपने प्यार के जाल में फंसा देते हैं तो उन्हें बाकायदा ईनाम, इकराम दिया जाता है। उन्हें सम्मानित किया जाता है€ और इस्लाम के लिए की गई उनकी इस सेवा के लिए उनकी शान में कसीदे पढे जाते हैं। दूसरे युवकों को इन लव जेहादियों से प्रेरणा ग्रहण करके इसी तर्ज पर इस्लाम की सेवा में जुटने आग्रह किया जाता है।देश के विभिन्न भागों में इन इस्लामी जेहादियों ने न जाने अभी तक जितनी हिन्दू लडकियों की जिन्दगियां तबाह कर दी और उन्हें वैश्यालयों में धकेल दिया। जहां तक भारत सरकार का ताल्लुक है उसकी दृष्टि में प्यार निहायत निजी मामला है जिसमें स्टेट का पडना ठीक नहीं है दूसरे शायद भारत सरकार इसे अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदाय में संबंध सुधारने का ही एक नया प्रयोग मान रही है। मुसलमानों की दशा और दिशा पर रपट तैयार करने वाले राजेन्द्र सच्चर जी को शायद इस लव जेहाद की समय पर खबर नहीं मिल पाई नहीं तो वे इन लव जेहादियों के इस बहादुराना काम पर कोई न कोई पुरस्कार मुकर्रर कर देते। वैसे तो भारत सरकार ने एक अल्पसंख्यक मंत्रालय ही खोल रखा है। कोई ताज्जुब नहीं यदि यह मुसलमानों को समान अवसर प्रदान क रने के नाम पर लव जेहाद के लिए ही किसी वजट राशि का प्रावधान कर दे। इस्लाम के कसीदे पढने वालों के लिए तो यह और भी अच्छा अवसर है। वे क ह सकते हैं कि जो जेहाद कश्मीर में हो रहा है तो वह तो खून खराबे वाला जेहाद है। इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता। यह लव जेहाद असली जेहाद है पावित्र और पाक !लेकिन केरल उच्च न्यायालय शायद लव जेहाद को इतना पवित्र और पाक नहीं मानता। उसने अभी हाल ही में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को आदेश दिया है कि इन लव जेहादियों के हाथों कितनी हिन्दू कन्याएं इनक षडयंत्रों का शिकार हुईं हैं इसके बारे में वह तुरंत एक विस्तृत रपट हलफनामा समेत न्यायालय में दाखिल करे। न्यायालय ने लव जेहाद के पीछे की शक्तियों को पहचानने के लिए भी कहा है। काबिलेगोर है कि केरल में लव जेहादियों द्वारा हिन्दू लडकियों को फांसने और बाद में उनका जीवन नर्क बनाने की अनेक घटनाएं हो चुंकी हैं कुछ लडकियां इन जेहादियों के चंगुल से छूटकर वापिस अपने घर पहुंची हैं और कुछ को पुलिस की मदद से ढूढा गया है। बदकिस्मिती से लोक-लाज के कारण माता पिता इस प्रकार की घटनाओं की रपट ही पुलिस के पास नहीं देते। इसलिए और कितनी हिन्दू लडकियों की जिंदगी इन लव जेहादियों के हाथों तबाह हो चुकी और कितनी लडकियां साउदी अरब के शेखों के हरम में पहुंच चुकी हैं इसका कोई हिसाब किताब नही हैं। लव जेहाद का यह प्रयोग केवल केरल में ही नहीं देश के दूसरे अनेक राज्यों में भी धडल्ले से किया जा रहा है। केरल की हिन्दू जनता में इसको लेकर बहुत गुस्सा व्यापक है। लेकिन इसके साथ ऐसा सामाजिक कलंक भी जुडा हुआ है जिसके कारण कोई भी इस विषय पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। केरल उच्च न्यायालय की इस पहल का केरल के हर क्षेत्र में स्वागत हुआ है। आशा करनी चाहिए कि सरकार जब न्यायालय में इस लव जेहाद की असली रपट प्रस्तुत करेगी तो कुछ और चेहरों से नकाब उठेगा। लेकिन असली प्रश्न यह है कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने के लिए अतिरिक्त उत्साह दिखाने वाली भारत सरकार क्या सचमुच लव जेहाद का परदाफाश करने की इच्छा रखती है?

Friday, 27 April 2012

श्यामाप्रसाद मुखर्जी


डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी महान शिक्षाविद, चिन्तक और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। भारतवर्ष की जनता उन्हें स्मरण करती है - एक प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में। उनकी मिसाल दी जाती है - एक कट्टर राष्ट्र भक्त के रूप में।भारतीय इतिहास उन्हें सम्मान से स्वीकार करता है - एक जुझारू, कर्मठ, विचारक और चिंतक के रूप में। भारतवर्ष के लाखों लोगों के मन में उनकी गहरी छबि अंकित है- एक निरभिमानी, देशभक्त की। वे आज भी आदर्श हैं - बुद्धजीवियों और मनीषियों के। वे आज भी समाए हुए हैं - लाखों भारतवासियों के मन में एक पथप्रदर्शक एवं प्रेरणापुंज के रूप में।
6 जुलाई, 1901 को कलकत्ता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में डॉ॰ श्यामाप्रसाद मुखर्जी जी का जन्म हुआ। उनके पिता श्री आशुतोष मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे एवं शिक्षाविद् के रूप में विख्यात थे। यह कहा जाता है कि होनहार बिरवान के होत चिकने पात पात। इस कहावत को डॉ श्यामाप्रसाद मुकर्जी ने चरितार्थ कर दिया। बाल्यकाल से ही उनकी अप्रतिम प्रतिभा की छाप दिखने लग गई थी। कुशाग्र बुिद्ध और जन्मजात प्रतिभासम्पन्न डॉ मुकर्जी ने 1917 में मेट्रिक तथा 1921 में बी ए की उपाधि प्राप्त की, पश्चात् 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित की एवं 1926 में वे इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बन स्वदेश लौटे। अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने अल्पायु में ही विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएँ अर्जित कीं, और शीघ्र ही उनकी ख्याति एक शिक्षाविद् और लोकप्रिय प्रशासक के रूप में चहुँ ओर फैलती गई। उन्होंने अपने ज्ञान से, अपने विचारों से तथा तात्कालिक परिदृश्य की ज्वलंत परिस्थितियों का इतना सटीक विश्लेषण व विवेचन किया कि समाज के हर वर्ग, तबके और बुिद्धजीवियों को उनकी बुिद्ध का कायल होना पड़ा। उनकी ख्याति और कीर्तिमानों को मान्यता मिली, सम्मान मिला और मात्र 33 वर्ष की अल्पायु में उन्हेंकलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति के अत्यन्त प्रतििष्ठत पद पर नियुक्ति दी गई। इस पद पर नियुक्ति पाने वाले वे सबसे कम आयु के कुलपति थे। एक विचारक, एक चिन्तक तथा प्रखर शिक्षाविद् के रूप में उनकी उपलब्धि तथा ख्याति निरंतर आगे बढ़ती गई।
ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की गुप्त योजना और षडयंत्र को एक दलविशेष के नेताओं ने अखण्ड भारत संबंधी अपने वादों को ताक पर रखकर विभाजन स्वीकार कर लिया। तब डॉ मुकर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खंडित भारत के लिए बचा लिया। गांधी जी और सरदार पटेल के अनुरोध पर वे खंडित भारत के पहले मंत्रिमण्डल में शामिल हुए, और उन्हें उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। संविधान सभा और प्रांतीय संसद के सदस्य और केंद्रीय मंत्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। किन्तु उनके राष्ट्रवादी चिंतन के साथ-साथ अन्य नेताओं से मतभेद बने रहे। फलत: राष्ट्रीय हितों की प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने प्रतिपक्ष के सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निर्वहन को चुनौती के रूप में स्वीकार किया, और शीघ्र ही अन्य राष्ट्रवादी दलों और तत्वों को मिलाकर एक नई पार्टी बनाई जो कि विरोधी पक्ष में सबसे बडा दल था। उन्हें पं जवाहरलाल नेहरू का सशक्त विकल्प माने जाने लगा। अक्टूबर, 1951 में भारतीय जनसंघ का उद्भव हुआ। जिसके संस्थापक अध्यक्ष, डॉ श्यामाप्रसाद मुकर्जी रहे।
संसद में उन्होंने सदैव राष्ट्रीय एकता की स्थापना को प्रथम लक्ष्य रखा। संसद में दिए अपने भाषण में उन्होंने पुरजोर शब्दों में कहा था कि राष्ट्रीय एकता की शिला पर ही भविष्य की नींव रखी जा सकती है। देश के राष्ट्रीय जीवन में इन तत्वों को स्थान देकर ही एकता स्थापित करनी चाहिए। क्योंकि इस समय इनका बहुत महत्व है। इन्हें आत्म सम्मान तथा पारस्परिक सामंजस्य के साथ सजीव रखने की आवश्यकता है। है। डॉ मुकर्जी जम्मू काश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू काश्मीर का अलग झंडा था, अलग संविधान था, वहा¡ का मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री कहलाता था। डॉ मुकर्जी ने जोरदार नारा बुलंद किया कि - एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगें। संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण में डॉ मुकर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की थी। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उदे्दश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूँगा। उन्होंने तात्कालिन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपनी दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वे 1953 में बिना परमिट लिए जम्मू काश्मीरकी यात्रा पर निकल पड़े। जहाँ उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबंद कर लिया गया। 23 जून, 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। वे भारत के लिए शहीद हो गए, और भारत ने एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया जो हिन्दुस्तान को नई दिशा दे सकता था।

देश को एक खतरनाक कानून से बचाएं:



एक अलोकतांत्रिक, साम्प्रदायिक व देश के बहुसंख्यक समाज के ऊपर दमनकारी कानून - 


2011(‘Prevention of Communal and Targeted Violence 


(Access to Justice and Reparations) Bill,2011’)                                                                                


को जानें तथा एक व्यापक जन जागरण कर इसे संसद में पारित होने से रोकें:

इसमें माना है कि सांप्रदायिक समस्या केवल बहुसंख्यक 


समुदाय के सदस्य ही पैदा करते है। 


अल्पसंख्यक समुदाय का कोई व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार नहीं है।


बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों के खिलाफ किए गए 


सांप्रदायिक अपराध तो दंडनीय है, किंतु अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों द्वारा बहुसंख्यकों के खिलाफ 


किए गए सांप्रदायिक अपराध दंडनीय नहीं है।

ऐसा इसलिए है, क्योंकि समूह की परिभाषा में बहुसंख्यक समुदाय के व्यक्तियों को शामिल नहीं 


किया गया है। बहुसंख्यक समुदाय का कोई व्यक्ति सांप्रदायिक हिंसा का शिकार नहीं हो सकता है।

अभियुक्त बहुसंख्यक समुदाय के ही होंगे। अधिनियम का अनुपालन एक ऐसे प्राधिकरण संस्था द्वारा 


किया जाएगा जिसमें निश्चित ही बहुसंख्यक समुदाय के सदस्य नगण्य या अल्पमत में होंगे।

पीड़ित के बयान केवल धारा 164 के तहत होंगे अर्थात अदालतों के सामने। यदि किसी व्यक्ति के ऊपर 


घृणा संबंधी प्रचार का आरोप लगता है तो उसे तब तक एक पूर्वधारणा के अनुसार दोषी माना जाएगा 


जब तक वह निर्दोष नहीं सिद्ध हो जाता। साफ है कि आरोप सबूत के समान होगा।

मुकदमे की कार्यवाही चलवाने वाले विशेष लोक अभियोजक सत्य की सहायता के लिए नहीं, बल्कि 


पीड़ित के हित में काम करेंगे।

शिकायतकर्ता पीडि़त का नाम और पहचान गुप्त रखी जाएगी। केस की प्रगति की रपट पुलिस 


शिकायतकर्ता को ही बताएगी।

एक गैर हिन्दू महिला के साथ किए गए दुर्व्यवहार को तो अपराध मानता है; परन्तु हिन्दू महिला के 


साथ किए गए बलात्कार को अपराध नहीं मानता जबकि साम्प्रदायिक दंगों में हिन्दू महिला का शील 


ही विधर्मियों के निशाने पर रहता है।

अल्पसंख्यक वर्ग के किसी व्यक्ति के अपराधिक कृत्य का शाब्दिक विरोध भी इस विधेयक के 


अन्तर्गत अपराध माना जायेगा। यानि अब अफजल गुरु को फांसी की मांग करना, बांग्लादेशी 


घुसपैठियों के निष्कासन की मांग करना, धर्मान्तरण पर रोक लगाने की मांग करना भी अपराध बन 


जायेगा।

भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुसार किसी आरोपी को तब तक निरपराध माना जायेगा जब 


तक वह दोषी सिद्ध न हो जाये; परन्तु, इस विधेयक में आरोपी तब तक दोषी माना जायेगा जब तक 


वह अपने आपको निर्दोष सिद्ध न कर दे। इसका मतलब होगा कि किसी भी गैर हिन्दू के लिए अब 


किसी हिन्दू को जेल भेजना आसान हो जायेगा। वह केवल आरोप लगायेगा और पुलिस अधिकारी 


आरोपी हिन्दू को जेल में डाल देगा।

यदि किसी संगठन के कार्यकर्ता पर साम्प्रदायिक घृणा का कोई आरोप है तो उस संगठन के मुखिया 


पर भी शिकंजा कसा जा सकता है।

संगठित सांप्रदायिक और किसी समुदाय को लक्ष्य बनाकर की जाने वाली हिंसा इस कानून के तहत 


राज्य के भीतर आंतरिक उपद्रव के रूप में देखी जाएगी। इसका अर्थ है कि केंद्र सरकार ऐसी दशा में 


अनुच्छेद 355 का इस्तेमाल कर संबंधित राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने में सक्षम होगी। यदि 


प्रस्तावित बिल कानून बन जाता है तो केंद्र सरकार राज्य सरकारों के अधिकारों को हड़प लेगी।

विधेयक अगर पास हो जाता है तो हिन्दुओं का भारत में जीना दूभर हो जायेगा। देश द्रोही और हिन्दू 


द्रोही तत्व खुलकर भारत और हिन्दू समाज को समाप्त करने का षडयन्त्र करते रहेंगे; परन्तु हिन्दू 


संगठन इनको रोकना तो दूर इनके विरुध्द आवाज भी नहीं उठा पायेंगे। हिन्दू जब अपने आप को 


कहीं से भी संरक्षित नहीं पायेगा तो धर्मान्तरण का कुचक्र तेजी से प्रारम्भ हो जायेगा। इससे भी 


भयंकर स्थिति तब होगी जब सेना, पुलिस व प्रशासन इन अपराधियों को रोकने की जगह इनको 


संरक्षण देंगे और इनके हाथ की कठपुतली बन देशभक्त हिन्दू संगठनों के विरुध्द कार्यवाही करने के 


लिए मजबूर हो जायेंगे।


यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्षा के नाते एक केविनेट 


मंत्री के बराबर दर्जे का वेतन, भत्ते तथा स्टेट्स के साथ सुख सुविधाएं पा रही हैं । इसी परिषद ने यह 


विधेयक तैयार किया है। इसके सदस्यों और सलाहकारों में हर्ष मंडेर, अनु आगा, तीस्ता सीतलवाड़, 


फराह नकवी जैसे हिन्दू विद्वेषी तथा सैयद शहाबुद्दीन, जॉन दयाल, शबनम हाशमी और नियाज 


फारुखी जैसे घोर साम्प्रदायिक शक्तियों के हस्तक हों तो विधेयक के इरादे क्या होंगे, आसानी से आप 


इसकी कल्पना कर ही सकते हैं। इन सब को भी प्रधान मंत्री कार्यालय के माध्यम से धन राशि मिलती 


है।

देश के समस्त पूज्य संतों, राजनीतिज्ञों, प्रबुध्द वर्ग तथा राष्ट्र भक्त हिन्दू समाज से अनुरोध है कि 


केन्द्र सरकार के इस पैशाचिक विधेयक को रोकने के लिए सशक्त प्रतिकार करें।

Tuesday, 25 October 2011

दीपावली आदर्शों का त्योहार


दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लासपूर्ण था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए कार्तिक मास की घनघोर काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश पर्व हर्ष उल्लास से मनाते हैं। अधिकतर यह पर्व ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्तूबर या नवंबर महीने में पड़ती है। दीपावली दीपों का त्योहार है। इसे दीवाली या दीपावली भी कहते हैं। दिवाली अन्धेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दिवाली यही चरितार्थ करती है - असतो माऽ सद्गमय , तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग अपने घरों , दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन,सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता हैं। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा का सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे सजे-धजे नज़र आते हैं।
दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध कर के अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी मे आज भी लोग यह पर्व मनाते है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी धन्वंतरि प्रकट हुए। जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है। सिक्खों के लिए भी दिवाली महत्वपूर्ण है क्यों कि इसी दिन ही अमृतसर में १५७७ में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। और इसके अलावा १६१९ में दिवाली के दिन सिक्खों के छ्टे गुरु हरगोबिन्द सिंघ जी को जेल से रिहा किया गया था। नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्यों कि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शरू होता है।
पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय 'ओम' कहते हुए समाधि ले ली।महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की।दीन--इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे।मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेते थे।शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लाल किले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।
दीपावली के दिन भारत में विभिन्न स्थानों पर मेले लगते हैं।दीपावली एक दिन का पर्व नहीं अपितु पर्वों का समूह है। दशहरे के पश्चात ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग नए-नए वस्त्र सिलवाते हैं। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। इस दिन बाज़ारों में चारों तरफ़ जनसमूह उमड़ पड़ता है। बरतनों की दुकानों पर विशेष साज-सज्जा भीड़ दिखाई देती है। धनतेरस के दिन बरतन खरीदना शुभ माना जाता है अतैव प्रत्येक परिवार अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार कुछ कुछ खरीदारी करता है। इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुरदशी या छोटी दीपावली होती है। इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दीपावली आती है। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाज़ारों में खील-बताशे , मिठाइयाँ ,खांड़ के खिलौने , लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं स्थान-स्थान पर आतिशबाजियों और पटाखों की दुकानें सजी होती हैं। सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयाँ उपहार बाँटने लगते हैं। दीपमालादीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक मोमबत्तियाँ जलाकर रखते हैं। चारों ओर चमकते दीपक अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार गलियाँ जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों आतिशबाज़ियों का आनंद लेते हैं। रंग-बिरंगी फुलझड़ियाँ , आतिशबाज़ियाँ अनारों के जलने का आनंद प्रत्येक आयु के लोग लेते हैं। देर रात तक कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है। दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बनाया था। इसी दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है। दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बहीखाते बदल देते हैं। वे दुकानों पर लक्ष्मी पूजन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ़ की फसल पककर तैया हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता हैं।
परंपरा
अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाईचारे प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दिवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। सब मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाईचारे प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दिवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैं; नये कपड़े पहनते हैं। सब मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। आप सभी को दिपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।